यूपी विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और सेवा विस्तार पर हाईकोर्ट में चुनौती, क्वो वारंटो रिट की मांग

लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और उनके लंबे समय से पद पर बने रहने को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में उनकी नियुक्ति प्रक्रिया और सेवा विस्तार को नियमों तथा संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत बताते हुए उनके खिलाफ क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की गई है।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह ने स्वयं को इस प्रकरण की सुनवाई से अलग कर लिया। इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, जिसमें वह सदस्य न हों। न्यायालय ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश अथवा वरिष्ठ न्यायाधीश से नई पीठ नामित कराई जाए और उसके बाद मामले की सुनवाई की तारीख तय की जाए।

सुनवाई से अलग हुए न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह

यह मामला न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ था। जैसे ही याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह ने स्वयं को मामले की सुनवाई से अलग करने की बात कही। इसके बाद पीठ ने मामले की सुनवाई स्थगित करते हुए इसे नई पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का आदेश पारित कर दिया।

पूर्व सूचना अधिकारी ने दाखिल की याचिका

याचिका विधानसभा अध्यक्ष के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से अधिवक्ता रीना एन सिंह, चेतनारायण सिंह और सुधेंदु शेखर के माध्यम से दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदीप कुमार दुबे की प्रारंभिक नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक का पूरा कार्यकाल नियमों और संवैधानिक व्यवस्थाओं के अनुरूप नहीं है तथा वह बिना वैध अधिकार के प्रमुख सचिव पद पर बने हुए हैं।

नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए गए गंभीर सवाल

याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2009 में प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 के प्रावधानों की अनदेखी कर की गई थी। याचिकाकर्ता के अनुसार चयन श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि उस समय दुबे इस सीमा को पार कर चुके थे।

याचिका में कहा गया है कि 13 जनवरी 2009 को उन्होंने उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) के पद पर नियुक्त कर दिया गया। इसके छह दिन बाद 19 जनवरी 2009 को उन्हें विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार सौंप दिया गया।

बिना विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के नियुक्ति का आरोप

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया बिना किसी सार्वजनिक विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श और संविधान के अनुच्छेद 187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के बिना पूरी की गई।

इसके साथ ही वर्ष 2010-11 में सेवा नियमों में किए गए कथित संशोधनों को भी चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा पटल पर प्रस्तुत नहीं किया गया और इन्हीं के आधार पर लगातार सेवा विस्तार दिया जाता रहा।

65 वर्ष की आयु के बाद भी पद पर बने रहने का आरोप

याचिका के अनुसार प्रदीप कुमार दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके थे। बाद में मार्च 2020 में जारी अधिसूचना के जरिए सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह वर्तमान में भी प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं और उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक हो चुकी है।

आरटीआई में दस्तावेज उपलब्ध न होने का दावा

याचिका में कहा गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी के दौरान विभाग कोई वैध नियुक्ति आदेश, सेवा विस्तार आदेश, विभागीय प्रोन्नति समिति की संस्तुति अथवा लोक सेवा आयोग से परामर्श संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं करा सका। कई अपीलीय आदेशों में यह भी दर्ज किया गया कि मांगी गई सूचनाएं अभिलेखों में उपलब्ध नहीं हैं।

वित्तीय अनियमितताओं और पक्षपात के भी आरोप

याचिका में विधानसभा सचिवालय सहकारी समिति से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए हैं। दावा किया गया है कि करोड़ों रुपये के अनियमित ऋण और वित्तीय गड़बड़ियों से संबंधित शिकायतें राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, राज्यपाल सचिवालय और अन्य संस्थाओं को भेजी गई थीं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

इसके अलावा कुछ कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न, मनमानी नियुक्तियों और रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने जैसे आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। याचिका में विधानसभा सचिवालय के कर्मचारी प्रेमचंद्र पाल की शिकायत और बाद में हुई मृत्यु का भी जिक्र किया गया है।

सेवा से हटाए जाने का भी लगाया आरोप

याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह ने दावा किया है कि सूचना अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण सूचनाएं सार्वजनिक करने का प्रयास किया था। इसके चलते उन्हें प्रताड़ित किया गया और फरवरी 2024 में बिना कारण बताए सेवा से हटा दिया गया।

हाईकोर्ट से क्या मांग की गई है?

याचिका में हाईकोर्ट से मांग की गई है कि प्रदीप कुमार दुबे को प्रमुख सचिव पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार साबित करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही अंतिम निर्णय आने तक उन्हें पद से संबंधित अधिकारों के प्रयोग से रोका जाए और उनके द्वारा लिए गए प्रशासनिक निर्णयों को न्यायालय के अंतिम आदेश के अधीन रखा जाए।

 

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